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दशम गणित (Math Ten:Hindi Medium)

वास्तविक संख्याएँ

वैसी सभी संख्या, जिन्हें संख्या रेखा (नम्बर लाइन) पर दर्शाया जा सकता है, वास्तविक संख्या कहलाती हैं। वास्तविक संख्या को अंग्रेजी में रियल नम्बर (Real Number) कहा जाता है।

वास्तविक संख्या की यह परिभाषा 17वीं शताब्दी में रेन डेसकार्ट्स (Rene Descartes), जो फ्रांस के एक गणितज्ञ थे, ने दी थी।

सभी परिमेय संख्यां, जैसे कि पूर्णांक तथा भिन्न और सभी अपरिमेय संख्या जैसे कि `sqrt(2)` वास्तविक संख्या के अंतर्गत आती हैं।

वास्तविक संख्या के दो महत्वपूर्ण गुण हैं, यूक्लिड विभाजन एल्गोरिथ्म (कलन विधि) और अंकगणित की आधारभूत प्रमेय (Fundamental Theorem of Arithmetic)|

यूक्लिड विभाजन एल्गोरिथ्म (कलन विधि) के अनुसार, एक धनात्मक पूर्णांक a को किसी अन्य धनात्मक पूर्णांक b से इस प्रकार विभाजित किया जा सकता है कि शेषफल `r` प्राप्त हो, जो b से छोटा है।

दूसरी ओर अंकगणित की आधारभूत प्रमेय (Fundamental Theorem of Arithmetic) का संबंध धनात्मक पूर्णांकों के गुणन से संबंधित है, इसके अनुसार प्रत्येक भाज्य संख्या (कम्पोजिट नम्बर) को एक अद्वितीय रू से अभाज्य संख्याओं (प्राइम नम्बर) के गुणनफल के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। . . . . .


बहुपद

चर, अचर, चर के गुणांक तथा ऋणेतर घातांक (नॉन निगेटिव पावर) के जोड़, घटाव या गुणन की क्रिया वाले बीजगणीतीय ब्यंजक को बहुपद कहा जाता है। `x^2+4x-7`, `x^3+2x^2y-y+1`, `3x`, 5, इत्यादि बहुपद (पॉलिनोमियल) के कुछ उदाहरण हैं।

बहुपद को अंग्रेजी में पॉलिनोमियल (Polynomial) कहते हैं।

एक बहुपद (पॉलिनोमियल) में ऋणात्मक चिन्ह वाले घातांक, ऐसा कोई भी पद जो किसी चर से विभाजित हों, जैसे कि `1/x`, या कोई भी भिन्न वाले घातांक जैसे कि `x^(1/2)` नहीं हो सकते हैं। लेकिन एक बहुपद (पॉलिनोमियल) में अचर, चर या घात हो सकते हैं।

बहुपद (पॉलिनोमियल) को कई भागों में बाँटा जा सकता है, जैसे कि रैखिक बहुपद, द्विघात बहुपद, त्रिघात बहुपद, आदि। . . . .


दो चरों में रैखिक समीकरण युग्म

समीकरण, जिसको `ax+by+c=0` के रूप में रखा जा सकता या निरूपित किया जा सकता है, जहाँ, `a, b` तथा `c` वास्तविक संख्याएँ हैं तथा `a` एवं `b` दोनों शून्य नहीं हैं, (`a^2+b^2!=0`), दो चरों `x` और `y` में एक रैखिक समीकरण (LINEAR EQUATION IN TWO VARIABLES) कहलाता है।

उदाहरण के लिए `2x+3y-5=0` दो चरों `x` तथा `y` एक रैखिक समीकरण का उदाहरण है। यहाँ, `a=2, b=3` तथा `c =-5` जो कि वास्तविक संख्याएँ हैं, तथा `2^2+3^2!=0`

दो चरों `x` और `y` में समीकरणों को दो चरों में रैखिक समीकरणों का एक युग्म कहते हैं। दो चरों `x` और `y` में रैखिक समीकरणों के युग्म का व्यापक रूप है `a_1x+b_1y+c_1=0` तथा `a_2x+b_2y+c_2=0` जहाँ, `a_1, b_1, c_1, a_2, b_2, c_2` सभी वास्तविक संख्याएँ हैं और `a_1^2+b_1^2!=0`, और `a_2^2+b_2^2!=0` . . . . .


द्विघात समीकरण

चर `x` में समीकरण `ax^2+bx+c=0` के प्रकार को एक द्विघात का समीकरण कहते हैं। यह समीकरण `ax^2+bx+c=0, a!=0` द्विघात समीकरण का मानक रूप है। द्विघात समीकरण को अंग्रेजी में क्वाड्रैटिक इक्वेशन (Quadratic Equation) कहा जाता है।

यदि `alpha` द्विघात समीकरण `ax^2+bx+c=0` का मूल हो, तो समीकरण को `a\alpha^2+balpha+c=0` लिखा जाता है। यदि एक द्विघाती समीकरण `ax^2+bx+c=0` के लिये `b^2-4ac >=0` हो तो समीकरण के मूल `x= (-b+-sqrt(b^2-4ac))/(2a)` होता है।

किसी द्विघात समीकरण `ax^2+bx+c=0` के लिये `b^2-4ac` को विविक्तकर (डिस्क्रिमिनांट) कहते हैं।

अत: द्विघात समीकरण `ax^2+bx+c=0` का यदि विविक्तकर (डिस्क्रिमिनांट) `b^2-4ac >0` हो, तो समीकरण के दो भिन्न वास्तविक मूल होते हैं। तथा यदि विविक्तकर (डिस्क्रिमिनांट), `b^2-4ac =0` हो, तो समीकरण के दो बराबर वास्तविक मूल होते हैं। तथा यदि विविक्तकर (डिस्क्रिमिनांट), `b^2-4ac <0` हो, तो समीकरण का कोई वास्तविक मूल नहीं होता है। . . . .


समांतर श्रेणी

संख्याओं की एक ऐसी सूची है जिसमें प्रत्येक पद (पहले पद के अतिरिक्त) अपने पद में एक निश्चित संख्या जोड़ने पर प्राप्त होता है, को समांतर श्रेणी कहते हैं। समांतर श्रेणी को अग्रेजी में अर्थमैटिक प्रोग्रेशन (Arithmetic Progression) कहते हैं तथा इसे संक्षिप्त में `AP` लिखा जाता है।

जैसे 2, 4, 6, 8 , ...... समांतर श्रेणी का एक उदाहरण है।

समांतर श्रेणी में संख्या की सूची का प्रत्येक संख्या एक पद (term) कलाता है। इस सूची में दूसरा पद पहले पद में 2 जोड़ने पर, तीसरा पद दूसरे पद में 2 जोड़ने पर, चौथा पद तीसरे पद में 2 जोड़ने पर प्राप्त होता है। अत: दिया गया सूची एक समांतर श्रेणी है।

संख्या की सूची की प्रथम संख्या प्रथम पद कहलाती है। इसी तरह दूसरी संख्या दूसरा पद, तीसरी संख्या तीसरा पद, ..... कहलाता है।

इस दी गई सूची में, वह निश्चित संख्या 2, जिसे जोड़ने पर सूची की अगली संख्या प्राप्त होती है, को सार्व अंतर (Common difference) कहते हैं। दूसरे शब्दों में प्रत्येक अगले पद तथा पूर्व पद का अंतर सार्व अंतर (Common difference) कहलाता है। सार्व अंतर धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकता है। सार्व अंतर को `d` से निरूपित किया जाता है। . . . . .


त्रिभुज

बहुभुज (पॉलिगॉन), जिसके तीन भुजाएँ और तीन शीर्ष हों, त्रिभुज कहलाता है। दूसरे शब्दों में तीन भुजाओं से घिरी हुई आकृति त्रिभुज कहलाती है। एक त्रिभुज के तीनों भुजाओं का योग `180^o` होता है। कोणों तथा भुजाओं के माप के आधार पर त्रिभुज कई प्रकार के होते हैं, जैसे समबाहु त्रिभुज, समद्विबाहु त्रिभुज, विषमबाहु त्रिभुज, समकोण त्रिभुज, न्यूनकोण त्रिभुज तथा अधिककोण त्रिभुज।

भुजाओं की समान संख्या वाले दो बहुभुज समरूप होते हैं, यदि उनके सभी संगत कोण बराबर हों तथा उनकी सभी संगत भुजाएँ एक ही अनुपात अर्थात समानुपात में हों

अत: दो त्रिभुज समरूप होते हैं, यदि उनके संगत कोण बराबर हों तथा उनकी संगत भुजाएँ एक ही अनुपात में अर्थात समानुपाती हों। . . . .


त्रिकोणमिति का परिचय

त्रिकोणमिति में एक त्रिभुज की भुजाओं और कोणों के बीच संबंधों का अध्ययन किया जाता है। त्रिकोणमिति का शाब्दिक अर्थ है, तीन भुजाओं वाली बंद आकृति के तीन कोणों की माप या तीन कोणों को मापना|

त्रिकोणमिति को अंग्रेजी में Trigonometry कहते हैं। यह ग्रीक अके तीन शब्दों 'Tri + Gon + Metron' से मिलकर बना है।

जिसमें 'Tri ' का अर्थ है 'तीन', 'Gon' का अर्थ है 'भुजा' और 'Metron' का अर्थ है 'माप' अर्थात अंग्रेजी के शब्द 'Trigonometry' का पूर्ण अर्थ है, 'एक त्रिभुज के तीनों भुजाओं की माप'। . . . .


त्रिकोणमिति के कुछ अनुप्रयोग

त्रिकोणमिति का अध्ययन प्राचीन काल से होता आया है। त्रिकोणमिति के सिद्धांतों तथा तकनीकि का उपयोग कर बड़े बड़े वस्तुओं को देखकर उनसे समकोण त्रिभुज के बनने की कल्पना कर उन वस्तुओं की ऊँचाई तथा दूरी ज्ञात की जा सकती है।

त्रिकोणमिति का प्रयोग प्राचीन समय से आजतक खगोलविद पृथ्वी के ग्रहों और तारों की दूरियों के परिकलन के लिए करते आये हैं।

त्रिकोणमिति के अनुप्रयोग में पाइथागोरस प्रमेय के सिद्धांत का उपयोग मुख्य रूप से किया जाता है तथा उसकी सहायता से वास्तव में वास्तव में मापन किये बिना ही विभिन्न वस्तुओं की ऊँचाईयां और दूरियों को ज्ञात किया जा सकता है। . . . .


वृत्त

एक तल के उन बिन्दुओं का समूह जो एक नियत बिन्दु, जिसे केन्द्र कहते हैं, से अचर दूरी (त्रिज्या) पर होते हैं, वृत्त कहलाता है।

एक ही तल में स्थित एक वृत्त तथा एक रेखा की विभिन्न स्थितियाँ हो सकती हैं। एक ही तल में स्थित एक रेखा और वृत्त में यदि कोई उभयनिष्ठ बिन्दु नहीं है, तो ऐसी रेखा को वृत्त के सापेक्ष अप्रतिच्छेदी रेखा कहते हैं। यदि रेखा और वृत्त में दो उभयनिष्ठ बिन्दु हों तो रेखा को वृत्त की छेदक रेखा कहते हैं, और यदि रेखा और वृत्त में केवल एक उभयनिष्ठ बिन्दु हो, तो इस रेखा को वृत्त की स्पर्श रेखा कहते हैं।

वृत से संबंधित कई प्रमेय है, जैसे वृत्त के किसी बिन्दु पर स्पर्श रेखा स्पर्श बिन्दु से जाने वाली त्रिज्या पर लम्ब होती हैं।, बाह्य बिन्दु से वृत्त पर खींची गई स्पर्श रेखाओं की लम्बाईयाँ बराबर होती हैं, आदि . . . .


वृत्तों से संबंधित क्षेत्रफल

अन्य आकृत्तियों की तरह ही एक वृत्त द्वारा आच्छादित किये जाने वाले क्षेत्र को वृत्त का क्षेत्रफल कहते हैं। वृत्त का क्षेत्रफल वृत्त की त्रिज्या के वर्ग तथा एक यूनानी अक्षर `pi` (पाई) के गुणनफल से प्राप्त किया जाता है। अर्थात किसी वृत के क्षेत्रफल को सूत्र `pi\ r^2\ ` से ज्ञात किया जा सकता है, जहाँ `pi\ ` (पाई) एक यूनानी अक्षर है तथा इसका मान `22/7` होता है और `r\ ` वृत्त की त्रिज्या है।

एक वृत्त के अनुदिश एक बार चलने में तय की गई दूरी वृत्त का परिमाप होता है। वृत्त के परिमाप प्राय: परिधि [सर्कमफरेंश (Circumference)] कहा जाता है। वृत्त की परिधि का उसके व्यास के साथ एक अचर अनुपात होता है। वृत्त की परिधि का उसके व्यास के इस अचर अनुपात को यूनानी अक्षर `pi\ ` (पाई) से निरूपित किया जाता है। `pi\ ` (पाई) एक अपरिमेय संख्या (Irrational Number) है और इसका दशमलव प्रसार अनवसानी और अनावर्ती (non–terminating and non–repeating) होता है। परंतु व्यवहार में `pi\ ` (पाई) का माना `22/7` या 3.14 लिया जाता है। . . . . .


पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन

हमारे आसपास घनाभ, शंकु, बेलन, गोले आदि आकृतियों से बनी हुई या इनमें से दो या दो से अधिक आकृतियों से बनी हुए बहुत सारी वस्तुएँ देखने को मिलती हैं। इस वस्तुओं का दैनिक जीवन में बहुत सारे उपयोग हैं। जैसे एक ट्रक के पीछे लगा हुआ बेलन के आकार के कंटेनर का उपयोग तेल, गैस आदि को एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाने के लिए किया जाता है। इनके सही सही उपयोग करने की सुविधा के लिए इनके पृष्ठीय क्षेत्रफल तथा आयतन निकालने की आवश्यकता होती है। जैसे किसी तेल के कंटेनर में अधिकतम कितना तेल आ सकता है, यह जानने के लिए उस कंटेनर के आयतन निकालने की आवश्यकता होती है।

एक बेलन के आयतन को सूत्र `pi\ r^2\ h\ ` से ज्ञात किया जाता है। उसी प्रकार किसी गोले के सम्पूर्ण पृष्ठ का क्षेत्रफल `4\ pi\ r^2\ ` सूत्र की सहायता से किया जा सकता हैं। यहाँ `r\ ` दी गई आकृत्ति की त्रिज्या तथा `h\ ` उसकी ऊँचाई है। . . . .