अम्ल, क्षारक और लवण


अम्लीय तथा क्षारीय पदार्थ

पदार्थों को उनके कुछ विशेष गुणों के आधार पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है, ये भाग हैं अम्ल, क्षारक तथा लवण

अम्ल (एसिड)

बहुत सारे पदार्थों में अम्ल पाया जाता है। इन पदार्थों में अम्ल पाये जाने के कारण इनका स्वाद खट्टा होता है।

उदाहरण: नींबू, दही, इमली, टमाटर, अचार, इत्यादि

दूसरे शब्दों में कहें तो वैसे पदार्थ जिनका स्वाद खट्टा होता है में अम्ल पाया जाता है। या अम्ल पाये जाने के कारण किसी पदार्थ का स्वाद खट्टा होता है।

वैसे पदार्थ जिनका स्वाद खट्टा होता है के रासायनिक गुण को अम्लीय कहा जाता है।

अम्ल को अंग्रेजी में "एसिड (acid)" कहा जाता है। "एसिड (acid)" शब्द लैटिन के शब्द "एसियर (acere)" से आया है, जिसका अर्थ खट्टा होता है। लैटिन में अम्ल (एसिड) के लिए एक और अलग शब्द है "एसिडस (acidus)".

क्षारक

बहुत सारे पदार्थों में क्षारक पाया जाता है। क्षारक का स्वाद कड़वा होता है। अर्थात वैसे पदार्थ जिसमें क्षारक पाया जाता है, का स्वाद कड़वा होता है।

क्षारक को ऊँगलियों के बीच रगड़ने पर यह साबुन जैसा प्रतीत होता है।

अत: पदार्थ जिनका स्वाद कड़वा होता है तथा छूने में साबुन के जैसा प्रतीत होता है, क्षारक कहलाता है।

उदाहरण: बेकिंग सोडा, कॉस्टिक सोडा (धोवन सोडा), बेकिंग पाउडर, साबुन, इत्यादि।

क्षारक को "अलकली तथा भस्म" भी कहा जाता है।

पदार्थ जिसमें क्षारक होता है के रासायनिक गुण को क्षारीय प्रकृति का कहा जाता है।

सूचक (इंडिकेटर)

सभी पदार्थों को चखना संभव नहीं है, अत: उनके अम्लीय तथा क्षारीय गुण का पता लगाने के लिए एके विशेष प्रकार के पदार्थ का उपयोग किया जाता है जिसे सूचक कहा जाता है। सूचक को अंग्रेजी में "इंडिकेटर" कहा जाता है। सूचक को अम्ल क्षरक सूचक भी कहा जाता है।

पदार्थ जो किसी घोल के साथ मिलने पर रंग में परिवर्तन कर उसके अम्लीय या क्षारीय प्रकृति को निर्दिष्ट करते हैं अर्थात सूचना देते हैं, सूचक कहलाते हैं।

उदाहरण: लिटमस, हल्दी, गुड़हल, फेनॉल्फथैलीन, आदि सूचक के कुछ उदाहरण हैं।

लिटमस: एक प्राकृतिक सूचक

लिटमस सामान्य रूप से उपयोग किये जाने वाला सबसे प्रचलित सूचक है। लिटमस के उपयोग से किसी भी पदार्थ के आम्लिक या क्षारीय गुण का पता लगाया जाता है।

लिटमस एक रंजक है जिसे लाइकेन नाम के पौधों से प्राप्त किया जाता है। लिटमस विलयन का रंग प्राकृतिक रूप से नीलशोण [मॉव (Mauve)] होता है। लिटमस की खोज नीदरलैंड में रहने वाले स्पेन के एक वैज्ञानिक अरलानडस द विला नोवा द्वारा की गयी थी।

"लिटमस" शब्द का उपयोग नॉर्स द्वारा रंग या रंजक के लिए किया जाता था।

लिटमस लाल रंग में बदल जाता है जब इसमें अम्लीय घोल मिलाया जाता है। अर्थात अम्ल के साथ लिटमस लाल रंग का हो जाता है।

लिटमस क्षारक के साथ ब्लू (नीला) रंग में बदल जाता है। या जब लिटमस को क्षारक में मिलाया जाता है तो यह नीले रंग का हो जाता है।

संक्षिप्त शब्दों में लिटमस अम्ल के साथ लाल रंग तथा क्षार के साथ नीले रंग का हो जाता है। दूसरे शब्दों में किसी घोल के साथ मिलाने पर यदि लिटमस नीले रंग का हो जाय तो वह घोल क्षारीय तथा यदि लाल रंग में बदल जाय तो वह घोल अम्लीय है।

लिटमस पेपर

विलयन के अलावे लिटमस कागज की छोटी छोटी आयताकार टुकड़ों में भी उपलब्ध होता है जिन्हें लिटमस पत्र या लिटमस पेपर कहा जाता है। लिटमस पत्र नीला और लाल दो रंगों में उपलब्ध होता है।

नीले लिटमस पेपर को अम्ल या अम्लीय घोल में डुबोने पर यह लाल रंग में बदल जाता है, जबकि एक लाल रंग के लिटमस पत्र को अम्ल या अम्लीय घोल में डुबोने में इसके रंग में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

एक लाल लिटमस पत्र को क्षार या क्षारीय घोल में डुबोने पर यह नीले रंग में बदल जाता है, जबकि एक नीले रंग के लिटमस पत्र को क्षार या क्षारीय घोल में डुबोने में इसके रंग में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

हल्दी: एक प्राकृतिक सूचक

हल्दी एक सूचक के रूप में कार्य करता है।

हल्दी का घोल क्षारक या क्षारीय घोल या क्षारीय पदार्थ के साथ मिलकर लाल-भूरे रंग में बदल जाता है।

छ्न्ना पत्र या ब्लॉटिन पेपर को हल्दी के घोल में डुबोकर हल्दी पत्र तैयार किया जा सकता है।

कई बार कपड़ों पर सब्जी या करी गिर जाने के कारण उनपर हल्दी के पीले धब्बे लग जाते हैं। ऐसा सब्जी या करी में हल्दी के उपयोग होने के कारण होता है। जब कपड़ों के हल्दी के इन धब्बों को धोने के क्रम में साबुन या सर्फ लगाया जाता है, तो ये धब्बे लाल-भूरे रंग में बदल जाते हैं, जिन्हें पानी से धोने और कपड़ों के सूख जाने के बाद हल्दी के ऐ धब्बे पुन: पीले रंग में बदल जाते हैं।

ऐसा साबुन या सर्फ के क्षारीय होने के कारण होता है। क्षार हल्दी के धब्बों या घोल को लाल-भूरे रंग में बदल देता है।

इसका अर्थ यह है कि किसी पदार्थ या घोल के क्षारीय होने की पहचान हल्दी के उपयोग के द्वारा की जाती है।

हल्दी का घोल या धब्बों पर अम्ल या अम्लीय घोल मिलाने पर इसके रंग में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

हल्दी पत्र या पेपर को बनाना

* हल्दी का थोड़ा सा पाउडर लें।

* हल्दी के इस पाउडर में जल मिलाकर इसका एक पेस्ट या गाढ़ा घोल तैयार कर लें।

* ब्लॉटिन पेपर का एक शीट या एक छन्ना पत्र लीजिए।

* इस ब्लॉटिन पेपर या छन्ना पत्र पर हल्दी का पेस्ट लगा दें या इसे हल्दी के गाढ़े घोल में डुबो कर अच्छी तरह भीगने के बाद बाहर निकाल लें।

* अच्छी तरह सूख जाने के बाद इसे छोटे छोटे टुकड़ों में काट लें। इन्हें लगभग 1 cm चौड़े और 3 cm लम्बे आयताकार टुकड़ों में काटना बेहतर होगा।

हल्दी पेपर के द्वारा किसी घोल के अम्लीय या क्षारीय प्रकृति की जाँच

* सीसे के एक ग्लास या कप में थोड़ा पानी लीजिए।

* इसमें थोड़ा (लगभग एक चुटकी) सर्फ (डिटरजेंट पाउडर) घोल लीजिए।

* सीसे के एक दूसरे ग्लास में भी थोड़ा पानी लीजिए।

* एक नींबू के रस को इस दूसरे ग्लास में रखे पानी में मिला दीजिए।

* अब दो हल्दी पेपर लेकर एक को सर्फ वाले ग्लास में तथा दूसरे को नींबू के रस वाले ग्लास में डुबोकर बाहर निकाले लें।

* दोनों हल्दी पत्र के रंग को ध्यान से देखिए।

आप देखेंगे कि सर्फ वाले ग्लास में डुबोया गया हल्दी पत्र गहरे लाग-भूरे रंग का हो गया है। परंतु नींबू के रस में डुबोया गया हल्दी पत्र के रंग में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।

हल्दी पत्र के लाल भूरे रंग में बदल जाना सर्फ वाले पानी में क्षारक की उपस्थिति को बतलाता है। अर्थात सर्फ (डिटरजेंट) क्षारीय होता है।

लेकिन हल्दी के रंग में अम्ल के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता है।

चाइना रोज (गुड़हल) : एक दूसरा प्राकृतिक सूचक

गुड़हल (चाइना रोज) के पत्तियों का जल भी एक प्राकृतिक सूचक का काम करता है।

गुड़हल (चाइना रोज) के पुष्प का जल का रंग गुलाबी होता है।

गुड़हल (चाइना रोज) के पुष्प के जल में अम्ल मिलाया जाता है, तो यह गहरे गुलाबी रंग (मैग्नेटा) में बदल जाता है। तथा जब गुड़हल (चाइना रोज) के पुष्प के जल में क्षारक मिलाया जाता है तो यह हल्के हरे रंग में बदल जाता है।

गुड़हल (चाइना रोज) के पुष्प का जल, (हल्का गुलाबी रंग का होता है) ⇒ गहरे गुलाबी रंग में बदल जाता है जब इसमें अम्ल मिलाया जाता है।

गुड़हल (चाइना रोज) के पुष्प का जल, (हल्का गुलाबी रंग का होता है) ⇒ हल्के हरे रंग में बदल जाता है जब इसमें क्षारक मिलाया जाता है।

गुड़हल (चाइना रोज) के पुष्प का जल, (हल्का गुलाबी रंग का होता है) ⇒ उदासीन जल अर्थात आसवित जल के साथ रंग में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

फेनॉल्फथैलीन : एक दूसरा सूचक

फेनॉल्फथैलीन एक तरल पदार्थ है जिसका उपयोग अम्ल या क्षारक का पता लगाने के लिए सूचक के रूप में होता है। फेनॉल्फथैलीन भी एक प्रचलित सूचक है जो एक रंगहीन तरल पदार्थ है।

फेनॉल्फथैलीन अम्ल के साथ मिलाने पर रंगहीन ही रहता है। फेनॉल्फथैलीन को क्षारक के साथ मिलाने पर यह गुलाबी रंग में बदल जाता है।

फेनॉल्फथैलीन (रंगहीन) ⇒ अम्ल के साथ रंग में कोई परिवर्तन नहीं

फेनॉल्फथैलीन (रंगहीन) ⇒ क्षारक के साथ हल्का गुलाबी रंग में बदल जाता है।

उदासीन तरल पदार्थ या घोल

तरल जो न तो अम्लीय है और न ही क्षारीय, उदासीन तरल कहलाता है।

आसवित जल (डिस्टिल्ड वॉटर) उदासीन होता है।

उदासीनीकरण

अम्लीय घोल + क्षारीय घोल ⇒ उदासीन घोल

अम्ल तथा क्षार एक दूसरे को उदासीन कर देते हैं।

इसका अर्थ यह है कि जब एक अम्लीय घोल को क्षारीय घोल में एक विशेष निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है तो दोनों एक दूसरे को उदासीन बना देते हैं। इस प्रक्रिया को उदासीनीकरण या उदासीनीकरण प्रतिक्रिया कहा जाता है। इस प्रक्रिया में लवण तथा जल प्राप्त होता है तथा इसके साथ ही उष्मा निकलती है।

उसी प्रकार जब एक क्षारीय घोल को अम्लीय घोल में एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है, तो वह एक दूसरे को उदासीन बना देते हैं। तदनुसार यह प्रक्रिया को उदासीनीकरण या उदासीनीकरण प्रतिक्रिया कहलाती है। इस प्रक्रिया में लवण तथा जल प्राप्त होता है तथा इसके साथ ही उष्मा निकलती है।

अत: अम्लीय घोल तथा क्षारीय घोल के बीच होने वाली प्रक्रिया को उदासीनीकरण या उदासीनीकरण प्रतिक्रिया कहा जाता है। चूँकि उदासीनीकरण की प्रक्रिया में उष्मा भी निकलती है अत: उदासीनीकरण प्रक्रिया को उष्माक्षेपी प्रतिक्रिया भी कहा जाता है।

एक अम्लीय घोल तथा क्षारीय घोल के बीच होने वाली उदासीनीकरण की प्रतिक्रिया को निम्नांकित रूप से निरूपित किया जा सकता है।

अम्ल + क्षार ⇒ लवण + जल + उष्मा

उदाहरण:

जब हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के विलयन को सोडियम हाइड्रोक्साइड के विलयन में मिलाया जाता है तो दोनों एक दूसरे को उदासीन बना देते हैं। इस प्रतिक्रिया में सोडियम क्लोराइड [साधारण नमक (एक प्रकार का लवण)] तथा जल बनता है। इसके साथ ही उष्मा निकलती है।

इस प्रतिक्रिया को निम्नांकित रूप से दर्शाया जा सकता है।

हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) + सोडियम हाइड्रोक्साइड (NaOH) ⇒ सोडियम क्लोराइड (NaCl) + जल (H2O) + उष्मा

दैनिक जीवन में उदासीनीकरण

हमारे दैनिक जीवन में उदासीनीकरण के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं।

अपाचन

हमारा अमाशय हाइड्रोक्लोरिक अम्ल स्त्रावित करता है। यह हाइड्रोक्लोरिक अम्ल खाना में यदि कोई बैक्टीरिया हो तो, उसे मारता है तथा भोजन के पाचन में सहायता करता है।

कई बार आवश्यकता से अधिक खाना खा लेने या कोई वैसा खाना जिसका पाचन आसानी से नहीं हो पाता है, खा लेने के कारण हमारा अमाशय आवश्यकता से अधिक अम्ल स्त्रावित करने लगता है। इस आवश्यकता से अधिक अम्ल स्त्रावित होने के कारण पेट में जलन, खट्टी डकार, गैस आदि की समस्या हो जाती है। इस स्थिति को अपाचन कहा जाता है। अमाश्य द्वारा आवश्यकता से अधिक अम्ल स्त्रावित करने की स्थिति को एसिडिटी या हाइपर एसिडिटी भी कहा जाता है।

कई बार अपाचन काफी कष्टदायक हो जाता है। अपाचन से मुक्ति पाने के लिए प्रतिअम्ल, जो एक प्रकार की दवा होती है तथा टैबलेट या सिरप के रूप में उपलब्ध होता है, लेना पड़ता है। प्रतिअम्ल में मुख्य रूप से क्षारक होता है, जो अम्ल को उदासीन कर देता है तथा हमें अपाचन से मुक्ति मिलती है।

प्रति + अम्ल = प्रतिअम्ल

स्पष्ट रूप से प्रतिअम्ल वैसा पदार्थ या दवा है जो अम्ल के विरूद्ध कार्य करती है।

मिल्क ऑफ मैग्नीशिया, इनो, डाइजीन, आदि कुछ प्रचलित प्रतिअम्लीय दवा है, जो बाजार में आसानी से उपलब्ध है। ध्यान रहे बिना डॉक्टर की सलाह के कोई दवा न लें।

चींटी का डंक

चींटी को सुरक्षा के लिए प्राकृतिक ने एक हथियार, डंक दिया है, जिससे वह जरूरत के समय अपनी रक्षा करती है। चींटी काटने के क्रम में डंक के साथ फॉर्मिक अम्ल त्वचा के अंदर इंजेक्ट कर देती है। इस अम्ल के त्वचा के अंदर प्रविष्ट हो जाने के कारण चींटी द्वारा काटे गये स्थान पर जलन तथा दर्द होने लगता है।

इस दर्द से मुक्ति पाने के लिए, चींटी द्वारा काटे गये स्थान पर नमीयुक्त खाने का सोडा (सोडियम बाइकार्बोनेट), या कोई अन्य मृदुल क्षारक जैसे कैलेमाइन का विलयन जिसमें जिंक कार्बोनेट होता है, लगाया जाता है। खाने का सोडा या जिंक कैलामाइन विलयन एक क्षारक होता है जो चींटी द्वारा काटे गये स्थान पर प्रविष्ट कराये गये फॉर्मिक अम्ल को उदासीन बना देता है, और चींटी द्वारा काटे गये व्यक्ति को दर्द से राहत मिलती है।

मृदा उपचार

खेती के क्रम में अधिक उर्वरक के उपयोग होने के कारण कई बार मिट्टी में अम्ल या क्षार की मात्रा बढ़ जाती है। अम्ल की मात्रा बढ़ जाने से मृदा (मिट्टी) अधिक अम्लीय हो जाती है तथा क्षार की मात्रा बढ़ जाने के कारण मृदा अधिक क्षारीय हो जाती है। मिट्टी के अधिक अम्लीय या क्षारीय हो जाने के कारण इसमें फसल के पौधों की बृद्धि अच्छी नहीं होती है जिससे उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

यह समस्या से मुक्ति पाने के लिए खेत की मृदा (मिट्टी) के अम्लीय या क्षारीय प्रकृति के अनुसार उपचार किया जाता है ताकि फसल पुन: अच्छी होने लगे।

मृदा में अम्ल की मात्रा बढ़े होने की स्थिति में खेतों में कली चूना (कैल्शियम ऑक्साइड) या बुझा हुआ चूना (कैल्शियम हाइड्रोक्साइड) मिलाया जाता है, जो क्षारक होता है। यह क्षारक मिट्टी में अधिक अम्ल की मात्रा को उदासीन बना देता है, जिससे खेत की मिट्टी पुन: अच्छी फसल देने लगती है तथा उपज अच्छी हो जाती है।

उसी प्रकार मृदा में क्षारक की मात्रा अधिक होने की स्थिति में इसमें जैव पदार्थ मिलाया जाता है। जैव पदार्थ अम्ल स्त्रावित करते हैं जो मिट्टी में वर्तमान क्षारक की मात्रा को उदासीन बना देता है। इससे मिट्टी पुन: खेती के उपयुक्त हो जाती है अर्थात उपजाऊ हो जाती है।

कारखाने का अपशिष्ट

कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट में कई प्रकार के अम्लीय पदार्थ मिले होते हैं जिससे यह अम्लीय हो जाता है। यदि इन अपशिष्ट को ऐसे ही सीधे जलाशयों में बहा दिया जाय अर्थात विसर्जित कर दिया जाय, तो जलाशय का पानी भी अम्लीय हो जायेगा। जलाशय के पानी के अम्लीय हो जाने से उसमें रहने वाले जीव तथा पौधे मर जायेंगे। इससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

अत: कारखाने के अपशिष्ट को जलाशय में बहाने से पहले उसे क्षारक से उपचारित किया जाता है। क्षारक कारखाने के अपशिष्ट में वर्तमान अम्ल को उदासीन बना देते है जिससे जलीय जीवों और पौधों की रक्षा के साथ साथ पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।

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Reference: