दैनिक पंचांग NewDelhi, Delhi, India
बैशाख, शुक्ल पक्ष षष्ठी
बुधवार, 22 अप्रैल, 2026
पंचांग का सारांशसूर्योदय: 05:52:40| सूर्यास्त: 18:46:57
आद्रा नक्षत्र। अतिगंड योग। कौलव करण
आज दिनांक 22 अप्रैल, 2026, बुधवार, NewDelhi, Delhi, India का पंचांग।
(1) तिथि: हिंदु पंचांग के अनुसार आज बैशाख, शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है, जो 22:41:32 बजे तक रहेगी। तदुपरांत शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि हो जायेगी।
हिंदु पंचांग के अनुसार एक पक्ष में कुल तीस तिथियाँ होती हैं तथा दो पक्षों, कृष्ण पक्ष तथा शुक्ल पक्ष का एक मास (महीना) होता है। इस तरह हिंदु पंचांग के अनुसार एक माह या मास या महीने में कुल तीस तिथियाँ होती हैं। हिंदु पंचांग के अनुसार सूर्योदय काल से तिथि का मापन किया जाता है। अर्थात हिंदु पंचांग में सूर्योदय के समय व्याप्त तिथि को ही उस दिन की तिथि मानी जाती है, जबकि अंग्रेजी तिथि का मापन रात्रि बारह बजे के बाद से किया जाता है। हिंदु पंचांग के अनुसार तिथि चंद्रमा तथा सूर्य के चाल से बने सापेक्षिक कोण के आधार पर निर्धारित की जाती है। चंद्रमा तथा सूर्य के बीच सापेक्षिक कोण के बारह डिग्री होने पर एक तिथि घटित होती है।
(2) नक्षत्र: हिंदु पंचांग के अनुसार आज आद्रा नक्षत्र है, जो 22:5:49 बजे तक रहेगा उसके बाद पुनर्वसु नक्षत्र प्रारंभ होगा।
पंचांग में नक्षत्र का अर्थ होता है, चंद्रमा का नक्षत्र अर्थात चंद्रमा किसी तिथि को जिस नक्षत्र में होता है, उस तिथि को वह नक्षत्र कहा जाता है। हिंदु पंचांग के अनुसार कुल सत्ताइस नक्षत्र होते हैं।
(3) योग: हिंदु पंचांग के अनुसार आज अतिगंड योग है, जो 9:8:11 बजे तक रहेगा उसके बाद सुकर्मा योग प्रारंभ होगा।
हिंदु पंचांग में योग, चंद्रमा और सूर्य के अंशों के योग के अनुसार निर्धारित की जाती है। पंचांग के अनुसार कुल सत्ताइस योग होते हैं।
(4) करण: हिंदु पंचांग के अनुसार आज कौलव करण है।
करण; तिथि तथा नक्षत्र की तरह ही समय के मापन की इकाई है।
हिंदु पंचांग के अनुसार करण तिथि के आधे भाग का मापन है। पंचांग के अनुसार कुल ग्यारह करण होते हैं,
जिसमें विष्टि करण को सबसे अशुभ माना जाता है। विष्टि करण को ही भद्रा के प्रचलित नाम से जाना जाता है। भद्रा काल को अशुभ मुहूर्त की श्रेणी में रखा गया है।
शास्त्रों में किसी भी शुभ कार्य को विष्टि करण के काल में करने की सलाह नहीं दी गयी है,
क्योंकि केवल शुभ मुहूर्त में ही किया गया कार्य फलदायी होता है।
पंचांग का विस्तृत विवरण
सूर्योदय : 05:52:40
सूर्यास्त : 18:46:57
दिनमान(hms): 12:54:17
रात्रिमान(hms): 11:04:45
सूर्योदय (अगले दिन): 05:51:42
सूर्योदय (पिछला दिन): 05:53:39
षष्ठी, शुक्ल पक्ष
समाप्त होने का समय : 22:41:32
कुल अवधि : 21hour 21min 45sec
शुरू होने का समय 1:0:19 hour
समाप्त होने का समय 22-04-2026 at 22:41:32
यह षष्ठी तिथि शुक्ल पक्ष का छठा दिन होता है। इसे छठ भी कहा जाता है।
अगली तिथि: सप्तमी, शुक्ल पक्ष
कौलव करण
करण के समाप्त होने का समय :12:0:39
आद्रा नक्षत्र
समाप्त होने का समय :22:5:49
आद्रा नक्षत्र का स्वामी : राहू
अगला नक्षत्र: पुनर्वसु
अतिगंड योग
योग के समाप्त होने का समय : 9:8:11
अगला योग: सुकर्मा
अभिजीत मुहूर्त
शुरू होने का समय: 11:54:0
समाप्त होने का समय: 12:45:37
कुल अवधि : 0:51:37
अमृत काल
शुरू होने का समय 12:52:27
समाप्त होने का समय 14:21:0
कुल अवधि: 1:28:32
त्याज्य/ विष काल
शुरू होने का समय 7:42:35
समाप्त होने का समय 9:11:7
अवधि: 1:28:32
राहु काल
शुरू होने का समय 12:19:48
समाप्त होने का समय 13:56:36
राहु काल की अवधि (hms) 1:36:47
गुलिक काल
शुरू होने का समय 10:43:1
समाप्त होने का समय 12:19:48
गुलिक काल की अवधि (hms) 1:36:47
यम गण्ड काल
शुरू होने का समय 7:29:27
समाप्त होने का समय 9:6:14
यम गण्ड काल की अवधि (hms) 1:36:47
शुरू होने का समय 11:54:0
समाप्त होने का समय 12:45:37
दुर्र मुहूर्त की अवधि 0:51:37
(1) लाभ चौघड़िया
प्रकार: शुभ
शुरू होने का समय: 5:52:40
समाप्त होने का समय: 7:29:27
अवधि: 1:36:47
(2) अमृत चौघड़िया
प्रकार: शुभ
शुरू होने का समय: 7:29:27
समाप्त होने का समय: 9:6:14
अवधि: 1:36:47
(3) काल चौघड़िया
प्रकार: अशुभ
शुरू होने का समय: 9:6:14
समाप्त होने का समय: 10:43:1
अवधि: 1:36:47
(4) शुभ चौघड़िया
प्रकार: शुभ
शुरू होने का समय: 10:43:1
समाप्त होने का समय: 12:19:48
अवधि: 1:36:47
(5) रोग चौघड़िया
प्रकार: अशुभ
शुरू होने का समय: 12:19:48
समाप्त होने का समय: 13:56:36
अवधि: 1:36:47
(6) उद्वेग चौघड़िया
प्रकार: अशुभ
शुरू होने का समय: 13:56:36
समाप्त होने का समय: 15:33:23
अवधि: 1:36:47
(7) चर चौघड़िया
प्रकार: शुभ
शुरू होने का समय: 15:33:23
समाप्त होने का समय: 17:10:10
अवधि: 1:36:47
(8) लाभ चौघड़िया
प्रकार: शुभ
शुरू होने का समय: 17:10:10
समाप्त होने का समय: 18:46:57
अवधि: 1:36:47
(1) उद्वेग चौघड़िया
प्रकार: अशुभ
शुरू होने का समय: 18:46:57
समाप्त होने का समय: 20:10:3
अवधि: 1:23:5
(2) शुभ चौघड़िया
प्रकार: शुभ
शुरू होने का समय: 20:10:3
समाप्त होने का समय: 21:33:8
अवधि: 1:23:5
(3) अमृत चौघड़िया
प्रकार: शुभ
शुरू होने का समय: 21:33:8
समाप्त होने का समय: 22:56:14
अवधि: 1:23:5
(4) चर चौघड़िया
प्रकार: शुभ
शुरू होने का समय: 22:56:14
समाप्त होने का समय: 24:19:20
अवधि: 1:23:5
(5) रोग चौघड़िया
प्रकार: अशुभ
शुरू होने का समय: 24:19:20
समाप्त होने का समय: 25:42:25
अवधि: 1:23:5
(6) उद्वेग चौघड़िया
प्रकार: अशुभ
शुरू होने का समय: 25:42:25
समाप्त होने का समय: 27:5:31
अवधि: 1:23:5
(7) लाभ चौघड़िया
प्रकार: शुभ
शुरू होने का समय: 27:5:31
समाप्त होने का समय: 28:28:36
अवधि: 1:23:5
(8) उद्वेग चौघड़िया
प्रकार: अशुभ
शुरू होने का समय: 28:28:36
समाप्त होने का समय: 29:51:42
अवधि: 1:23:5
पंचांग क्या है?
पंचांग एक भारतीय कैलेंडर है। पंचांग चंद्रमा और सूर्य की चाल पर आधारित समय की गणना है क्योंकि ज्योतिष शास्त्र को कालविधान का शास्त्र कहा जाता है। काल अर्थात समय।
पंचांग संस्कृत के दो शब्दों "पंच" तथा "अंग" से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है "पाँच अंगों वाला" या वह जिसके पाँच अंग हैं।
पंचांग के पाँच अंग हैं तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करण।
(1) पंचांग के आधार पर तिथि क्या है?
पंचांग का प्रथम अंग तिथि है।
पंचांग में तिथि चंद्रमा और सूर्य की चाल या स्थिति के आधार पर निर्धारित की गयी है। चंद्रमा और सूर्य के बीच बारह डिग्री का अंतर होने पर एक तिथि व्यतीत होती है। इस तरह भारतीय ज्योतिष में आकाश, जो गोलाकार रूप में है, की परिधि कुल तीन सौ साठ डिग्री को कुल तीस तिथियों में विभाजित किया गया है। अर्थात पंचांग के अनुसार कुल तीस तिथि हैं, जिसमें पन्द्रह तिथि का एक पक्ष तथा एक माह में दो पक्ष होते हैं।
इस तरह पंचांग में तीस तिथियों का एक माह या महीना होता है, तथा बारह महीनों का एक वर्ष होता है।
पंचांग में प्रत्येक महीने को दो पक्षों में विभाजित किया गया है, प्रथम शुक्ल पक्ष तथा द्वितीय कृष्ण पक्ष। इस तरह पंचांग के अनुसार पंद्रह दिनों का एक पक्ष होता है। अर्थात शुक्ल पक्ष में पंद्रह तिथि तथा कृष्ण पक्ष में पंद्रह तिथि। तथा दोनों पक्षों को मिलाकर एक महीना कुल तीस तिथियों का होता है।
तिथियों के नाम क्रमश: प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्टी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी हैं। पंचांग में शुक्ल पक्ष की पन्द्रहवीं तिथि को पूर्णिमा तथा कृष्ण पक्ष की पंद्रहवीं तिथि को अमावस्या कहा जाता है।
उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत के पंचांग में माह की शुरूआत अलग अलग रीति से मानी जाती है। प्राय: उत्तर भारत में प्रचलित पंचांग के अनुसार महीने की शुरूआत कृष्ण पक्ष से मानी जाती है, जिसे पूर्णिमांत कहा जाता है। तथा दक्षिण भारत के पंचांग के अनुसार महीने की शुरूआत शुक्ल पक्ष से की जाती है, जिसे अमांत कहा जाता है।
पंचांग में तिथि की गणना सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक की जाती है।
(2) पंचांग के आधार पर वार क्या है?
पंचांग का दूसरा अंग वार है।
पंचांग में वार के नाम क्रमश: रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार या गुरूवार, शुक्रवार, तथा शनिवार है। इन वारों के अंग्रेजी नाम क्रमश: संडे, मंडे, ट्यूजडे, वेडनेसडे, थर्सडे, फ्राइडे, तथा सटरडे है।
(3) पंचांग के आधार पर नक्षत्र क्या है?
पंचांग का तीसरा अंग नक्षत्र है।
पंचांग में नक्षत्रों की कुल संख्या सत्ताइस हैं। भारतीय ज्योतिष के अनुसार नक्षत्रों के नाम क्रमश: अश्निनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्ता, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूला, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवणा, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्र, उत्तराभाद्र, तथा रेवती है, जो पंचांग में उल्लिखित रहता है।
इन सत्ताइस नक्षत्रों के अतिरिक्त एक अठाइसवें नक्षत्र की भी संकल्पना की गयी है जिसका नाम अभिजीत नक्षत्र है, हालांकि पंचांग में प्राय: अभिजीत नक्षत्र को नहीं दर्शाया जाता है। वैसे अभिजित नक्षत्र को काफी शुभ माना जाता है क्योंकि अभिजीत नक्षत्र में ही भगवान राम का जन्म हुआ है।
पंचांग में नक्षत्र की गणना चंद्रमा की चाल के आधार पर की जाती है। एक नक्षत्र का मान तेरह डिग्री बीस मिनट होता है। अर्थात पंचांग के अनुसार जब चंद्रमा शून्य से तेरह डिग्री बीस मिनट चलता है तो एक नक्षत्र व्यतीत होता है।
(4) पंचांग के आधार पर योग क्या है?
पंचांग का चौथा अंग योग है।
पंचांग में चंद्रमा तथा सूर्य के योग को "योग" कहते हैं।
नक्षत्र की तरह ही योग की कुल संख्या सत्ताइस है जैसा कि भारतीय पंचांग में गणना की जाती है। इस तरह एक योग का मान तेरह डिग्री बीस मिनट होता है।
पंचांग में योग की गणना चंद्रमा तथा सूर्य के कोणों के योग को तेरह डिग्री बीस मिनट से भाग देकर की जाती है।
पंचांग के अनुसार योगों के नाम क्रमश: विषकुम्भ योग, प्रीति योग, आयुष्मान योग, शौभाग्य योग, शोभन योग, अतिगण्ड योग, सुकर्मा योग, धृति योग, शूल योग, गण्ड योग, वृद्धि योग, ध्रुव योग, व्याघात योग, हर्षण योग, बज्र योग, सिद्धि योग, व्यतीपात योग, वरीयन योग, परिघ योग, शिव योग, सिद्ध योग, साध्य योग, शुभ योग, शुक्ल योग, ब्रह्म योग, ऐंद्र योग, एवं वैधृति योग। इन योगों को प्राय: विषकुम्भादि योग के नाम से जाना जाता है।
(5) पंचांग के आधार पर करण क्या है?
करण को पंचांग का पाँचवा अंग माना जाता है।
पंचांग के अनुसार करण, तिथि का अर्ध भाग है। पंचांग की गणना में सुविधा के लिए तिथि के अर्ध भाग की इकाई को निर्धारित किया गया है तथा इस इकाई का नाम करण रखा गया है।
भारतीय ज्योतिष के पंचांग के अनुसार करण की संख्या कुल ग्यारह है। जिसमें चार अचर या स्थिर करण तथा सात चर करण होते हैं।
भारतीय पंचांग के अनुसार स्थिर या अचर करण, जिनकी संख्या चार हैं, के नाम हैं किस्तुघ्न करण, शकुनि करण, चतुष्पद करण, तथा नाग करण।
तथा चर करण जिनकी संख्या सात हैं, के नाम हैं क्रमश: बव करण, बालव करण, कौलव करण, तैतिल करण, गर करण, वणिज करण, तथा विष्टि करण्।
इन पाँच अंगों के अतिरिक्त भी आज के आधुनिक पंचांग में अन्य कई जानकारियाँ दी जा रही हैं, यथा स्पष्ट ग्रह, ग्रहों की गति, दिनमान, रात्रिमान, सूर्योदय, सूर्यास्त, लग्न तालिका, व्रत एवं पर्वों की जानाकारी, मुहूर्त, वर कन्या मेलापक चक्र इत्यादि।
भारतीय ज्योतिष शास्त्र में पंचांग की उपयोगिता अत्यधिक है। वास्तव में पंचांग ज्योतिष शास्त्र के समग्र रूप को सार के रूप में प्रकट करता है यही कारण है कि ज्योतिष शास्त्र के विद्यार्थियों को सर्वप्रथम पंचांग देखना सिखलाया जाता है। ऐसा कहा गया है कि पंचांग के अध्ययन से एक मनुष्य ज्योतिष शास्त्र में निपुण हो सकता है।